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नाम अजामिल-से खल कोटि – गोस्वामी तुलसीदास

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केवट प्रसंग

नाम अजामिल-से खल कोटि अपार नदीं भव बूड़त काढ़े।
जो सुमिरें गिरि मेरु सिलाकन होत, अजाखुर बारिधि बाढ़े।।
तुलसी जेहि के पदपंकज तें प्रगटी तटिनी, जो हरै अघ गाढ़े।
ते प्रभु या सरिता तरिबे कहुँ माँगत नाव करारें है ठाढ़े।।

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शब्दार्थ

अजामिल- एक डाकू, खल- दुष्ट या दुर्जन, कोटि- करोड़ों, अपार- जिसका पार न पाया जाय, भव- संसार, सुमिरें- स्मरण करना, गिरि- पर्वत, मेरु- सुमेरू पर्वत, सिलाकन- पत्थर के टुकड़े के समान, अजाखुर- बकरी के खुर का चिह्न, बारिधि- समुद्र, पदपंकज- चरण कमल, तटिनी- गंगा, अघ गाढ़े- बहुत से पाप, ते- वे, सरिता- नदी, तरिबै- पार करने को, करारें- किनारे, ठाढ़े- खड़े।

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सन्दर्भ

प्रस्तुत पद्यांश 'केवट प्रसंग' नामक शीर्षक से लिया गया है। इसकी रचना 'गोस्वामी तुलसीदास' ने की है।

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प्रसंग

प्रस्तुत पद में भगवान राम के गंगा पार करने के लिए केवट के पास पधारने का वर्णन किया गया है।

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व्याख्या

जिस भगवान श्री राम ने अजामिल जैसे करोड़ों दुष्टों (दुर्जनों) को असीमित गहरे संसार रूपी सागर में डूबने से बचा लिया है। जिस प्रभु का स्मरण करते ही सुमेरू जैसे विशाल पर्वत भी पत्थर के टुकड़े के समान बन जाते हैं। बकरी के खुर के निशान में विशाल सागर दिखाई देते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस भगवान श्री राम के चरण कमलों से गंगा नदी प्रगट हुई है। गंगा नदी मनुष्य के पापों को दूर करती है। वे ही प्रभु श्री राम गंगा नदी को पार करने के लिए, उसके तट पर खड़े होकर केवट से नाव के द्वारा उस पर पहुँचाने का आग्रह कर रहे हैं।

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काव्य सौन्दर्य

प्रस्तुत पद से सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं–
1. प्रस्तुत पद्यांश में भगवान श्री राम की लीलाओं का वर्णन किया गया है।
2. भगवान श्री राम मानव रूप में गंगा नदी के किनारे खड़े होकर केवट से नदी पार कराने का आग्रह कर रहे हैं।
3. भाव अनुगामिनी भाषा का प्रयोग किया गया है।
4. अनुप्रास, रूपक आदि अलंकारों का प्रयोग किया गया है।
5. 'अजामिल' जैसे महापापी के उद्धार का उल्लेख किया गया है।
6. पौराणिक कथाओं से सम्बन्धित पद्य प्रस्तुत है।
7. प्रस्तुत पद्यांश में सामाजिक समरसता के भाव प्रकट किये गये हैं।

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अजामिल कौन था?

अजामिल एक डाकू था। नारद जी के द्वारा उपदेश देने पर उसे स्वयं द्वारा किए गए पापकर्मों का बोध हुआ। उसने अपने पापों का पश्चताप करने का प्रयत्न किया। नारद जी के कहने पर उसने अपने पुत्र का नाम 'नारायण' रखा। मरणासन्न अवस्था में उसके द्वारा अपने पुत्र का नाम 'नारायण' बारम्बार पुकारने पर अन्तिम समय में उसे मोक्ष प्राप्त हुआ।

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आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope, the above information will be useful and important.)
Thank you.
R.F. Tembhre
(Teacher)
EduFavour.Com

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