मध्य प्रदेश सेवारत शिक्षकों के लिए TET परीक्षा तैयारी - 2026
विषय - गणित
इकाई 1 संख्या पद्धति - 1000 से बड़ी संख्याओं को पढ़ना व लिखना, 1000 से बड़ी संख्या पर स्थानीय मान की समझ व चार मूलभूत संक्रियाएं।
संख्या पद्धति या संख्यांकन पद्धति वह है जिसमें संख्याओं को कुछ निर्धारित नियमों के अन्तर्गत सीमित प्रतीकों के समूह के उपयोग द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। जिन विशिष्ट प्रतीकों, चिन्हों से संख्याएँ प्रदर्शित की जाती हैं वे उस प्रणाली के 'अंक' कहलाते हैं।
→ देवनागरी लिपि (हिन्दी) के अंक - ०, १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९ हैं।
→ हिन्दू-अरबी संख्यांकन प्रणाली के अंक - 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 हैं। हिन्दू-अरबी संख्यांकन प्रणाली विश्व भर में प्रचलित है।
रोमन संख्यांकन पद्धति में केवल सात मूल प्रतीक हैं I, V, X, L, C, D, M。
इसमें I = 1, V = 5, X = 10, L = 50, C = 100, D = 500 और M = 1000 होता है।
रोमन संख्यांकन पद्धति में संख्या लिखने के नियम: I, X, C, M की पुनरावृत्ति की जाती है किंतु कोई भी चिन्ह तीन से अधिक बार नहीं लिखा जाता। छोटे मान की संख्या यदि बड़े मान की संख्या के बायीं ओर लिखी है तो उसका मान बड़ी संख्या में से घटा दिया जाता है और यदि बड़े मान की संख्या के दायीं ओर लिखी गई है तो उसे बड़ी संख्या से जोड़ दिया जाता है।
नोट - रोमन लिपि में स्थानीय मान की अवधारणा नहीं है। शून्य का प्रयोग सर्वप्रथम भारत में ही किया गया था।
इस पद्धति में कुल 10 अंक हैं। इनमें प्रयुक्त अंकों की उत्पत्ति भारत में हुई। भारत से अरब होते हुए ये अंक धीरे-धीरे यूरोप पहुंचे। यूरोपियों ने इन्हें अरबी अंक कहा क्योंकि उन्हें ये अंक अरबी लोगों से मिले किंतु स्वयं अरब के लोगों ने इन्हें हिन्दू अंक कहा। इस प्रकार यह संख्या पद्धति 'हिन्दू-अरेबिक' संख्या पद्धति कहलाती है।
(जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखी गई पुस्तक 'द डिस्कवरी आफ इंडिया' पुस्तक का अंश, पृष्ठ 317)
जब इकाइयाँ दस हो जाती हैं तो उसे एक दहाई कहा जाता है, इसी प्रकार जब दहाइयाँ दस हो जाती हैं तो सैकड़ा कहते हैं और दस सैकड़ों को हजार कहते हैं।
करोड़ | दस लाख | लाख | दस हजार | हजार | सैकड़ा | दहाई | इकाई
1,00,00,000 | 10,00,000 | 1,00,000 | 10,000 | 1,000 | 100 | 10 | 1
एक अंक की सबसे बड़ी संख्या 9 में 1 जोड़ने पर 10 प्राप्त होता है, जो दो अंकों की सबसे छोटी संख्या है। दो अंकों की सबसे बड़ी संख्या 99 में 1 जोड़ने पर 100 प्राप्त होता है, इसी प्रकार से तीन अंकों की सबसे बड़ी संख्या 999 में 1 जोड़ने पर 1000 प्राप्त होता है।
संख्याओं को स्थानीयमान तालिका में लिखने की प्रणाली की खोज भारत में हुई। शून्य की खोज के बारे में ऐतिहासिक तथ्य यह प्रकट करते हैं कि इसवी सन् के बहुत पहले से भारतीय शून्य के बारे में जानते थे। शून्य तथा स्थानीय मान इस संख्या पद्धति की विशेषताएँ हैं। इनकी सहायता से इन दस अंकों की सहायता से कोई भी संख्या सरलता से लिखी जा सकती है।
किसी भी संख्या में अंक 0 का स्थानीय मान सदैव शून्य होता है।
स्थानीय मान सारणी के माध्यम से किसी भी संख्या का विस्तारित रूप लिखा जा सकता है। हम संख्या विस्तार दायीं ओर से अंक लेकर करते हैं जो अंक जिस स्थान पर है उसे लिखकर उसके आगे जितने अंक हैं उतने शून्य लगा देते हैं फिर प्लस (+) चिन्ह लगाकर अगले अंक को लिखकर जितने अंक शेष हो उतने शून्य लगा देते हैं फिर (+) चिन्ह लगाकर आगे का अंक लिखकर शून्य बढ़ा देते हैं, यही प्रक्रिया इकाई के स्थान तक पहुंचकर की जाती है, इस तरह दी गई संख्या का विस्तारित रूप लिखा जा सकता है। यही प्रक्रिया इकाई की तरफ से प्रारंभ करके भी लिखी जा सकती है।
उदाहरण - 3,18,92,617 = 3,00,00,000 + 10,00,000 + 8,00,000 + 90,000 + 2,000 + 600 + 10 + 7
हमें पता है 5, 1 से बड़ी संख्या है जिसे 5 > 1 से प्रदर्शित करते हैं।
तुलना के नियम:
(i) यदि दो संख्याओं में अंकों की संख्या असमान हो तो जिस संख्या में अधिक अंक होते हैं वह संख्या बड़ी होगी।
(ii) यदि दो संख्याओं में अंकों की संख्या समान हो तो हम बायीं ओर के अंकों की तुलना करते हैं उनमें बड़े अंक वाली संख्या बड़ी होगी। यदि उन संख्याओं में सबसे बायीं ओर के अंक समान हैं तो हम उसके दायीं ओर वाले अंकों की तुलना करते हैं।
हम चिन्ह "<" (छोटा है) एवं ">" (बड़ा है) का प्रयोग संख्याओं की तुलना में करते हैं। यह हमेशा ध्यान दिया जाये कि हमेशा नोंक छोटी संख्या की ओर और खुला भाग बड़ी संख्या की ओर होना चाहिए।
→ सम संख्याएँ:
- दो-दो की जोड़ियाँ मिलाने पर जो संख्याएँ प्राप्त होती हैं, वे सम संख्याएँ होती हैं।
- जिन संख्याओं के इकाई के स्थान पर 0, 2, 4, 6, 8 होता है वे सम संख्याएँ होती हैं।
- जिन संख्याओं में 2 का पूरा-पूरा भाग चला जाता है या विभाजित हो जाती हैं वे सम संख्याएँ होती हैं।
→ विषम संख्याएँ:
- जिन संख्याओं की दो-दो की पूरी-पूरी जोड़ियाँ नहीं बनती हैं, वे विषम संख्याएँ होती हैं।
- जिन संख्याओं के इकाई के स्थान पर 1, 3, 5, 7, 9 होते हैं वे विषम संख्याएँ होती हैं।
- जिन संख्याओं में 2 का पूरा-पूरा भाग नहीं जाता है (जो 2 से पूरा विभाजित नहीं होती हैं) वे विषम संख्याएँ होती हैं।
गणन संख्याएँ संग्रह की कुल संख्या को प्रदर्शित करती हैं जबकि क्रम सूचक संख्या वस्तु की निश्चित किसी स्थान (प्रारंभिक स्थान से) स्थिति को प्रदर्शित करती हैं। गणन संख्याओं पर गणितीय संक्रियाएँ (जोड़ना, घटाना आदि) की जाती हैं जबकि क्रम सूचक संख्याओं के साथ संक्रियाएँ नहीं की जाती हैं।
उदाहरण - पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ... दसवाँ... उनन्चासवाँ... सौवाँ आदि क्रम सूचक संख्याएँ हैं।
सरल रेखा पर समान दूरी पर निशान लगाकर जब क्रमागत संख्याओं को प्रदर्शित करते हैं उसे संख्या रेखा कहते हैं। (गणन संख्याएँ एवं क्रम सूचक संख्याएँ दोनों ही संख्या रेखा पर प्रदर्शित की जा सकती हैं।)
संख्याओं को घटते क्रम में लिखने के लिए पहले बड़ी संख्या लिखते हैं उसके बाद ठीक छोटी, शेष बची संख्याओं में यही क्रम दोहराते हैं।
संख्याओं को बढ़ते क्रम में लिखने के लिए सबसे पहले सबसे छोटी संख्या लिखते हैं उसके बाद उससे बढ़कर, यही क्रम आगे भी दोहराते हैं।
हम अपने दैनिक जीवन के कार्यों में कई बार ऐसी संख्याओं का प्रयोग करते हैं। सामान्यतः हम वस्तुओं की सही संख्या के बारे में बातें करते हैं, लेकिन कभी-कभी उन संख्याओं के लगभग आकलन की जानकारी भी प्राप्त करते हैं। ऐसी स्थिति में हम दी गई संख्या का आवश्यकतानुसार दस, सौ या हजार के निकटतम निकटन कर लेते हैं।
निकटतम निकटन प्राप्त करने हेतु महत्वपूर्ण नियम:
→ यदि इकाई के स्थान का अंक 5 से छोटा है तो हम संख्या का निकटन नीचे की ओर करते हैं इसके लिए दहाई के अंक को ज्यों का त्यों लिखकर इकाई के स्थान पर शून्य लगा देते हैं।
→ यदि इकाई के स्थान का अंक 5 था 5 से बड़ा है तो दहाई के अंक में एक जोड़कर लिखते हैं तथा इकाई के स्थान पर शून्य लिखते हैं।
→ इसी प्रकार दहाई के अंक तथा सैकड़े के अंकों के आधार पर दहाई व सैकड़े के अंकों को भी लिखते हैं।
उदाहरण - 4256 का निकटतम निकटन
दहाई अंक तक -> 4260
सैकड़ा अंक तक -> 4300
हजार अंक तक -> 4000
किसी भी संख्या को लिखते समय अलग-अलग खण्डों के लिए अल्पविराम का प्रयोग करते हैं। अल्पविराम दये से बाएं लगाते हैं। पहला सैकड़े के बाद फिर हजार खंड के बाद फिर लाख खंड के बाद क्रमशः इसी तरह आगे बढ़ाते जाते हैं।
किसी संख्या में जो अंक जिस स्थानविशेष जैसे इकाई या दहाई या सैकड़ा आदि के स्थान पर है तो उसका स्थानीय मान उस स्थान के मान से दहाई या सैकड़े या हजार में होता है जैसे 4332 में 4 हजार के स्थान पर है तो उसका स्थानीय मान 4000 होगा। किसी अंक का अंकीय या जातीय मान वही अंक रहता है जो उसका वास्तविक मान है जैसे उपरोक्त संख्या में 4 का जातीय या अंकीय मान 4 ही होगा।
गणित की नींव चार बुनियादी संक्रियाओं (Fundamental Operations) पर टिकी हुई है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों को संख्याओं के साथ कार्य करने के लिए इन चारों संक्रियाओं की गहरी समझ होना आवश्यक है। ये चारों संक्रियाएं निम्नलिखित हैं:
1. जोड़ना (Addition)
अर्थ: दो या दो से अधिक संख्याओं या समूहों को मिलाकर एक कुल संख्या (योग) प्राप्त करने की प्रक्रिया को जोड़ना कहते हैं। इसे (+) चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है।
महत्व: यह सबसे पहली और सहज गणितीय संक्रिया है जिसे बच्चा सीखता है। जैसे- दैनिक जीवन में वस्तुओं का संग्रह ज्ञात करना।
2. घटाना (Subtraction)
अर्थ: किसी दी गई संख्या या समूह में से किसी अन्य संख्या को कम करने या निकालने की प्रक्रिया को घटाना कहते हैं। इसे (-) चिन्ह से दर्शाया जाता है।
महत्व: यह जोड़ की विपरीत संक्रिया है। इससे यह ज्ञात होता है कि किसी वस्तु के कुल समूह में से कुछ भाग कम होने पर कितना शेष बचा।
3. गुणा (Multiplication)
अर्थ: गुणा असल में बार-बार जोड़े जाने (Repeated Addition) का संक्षिप्त रूप है। जब किसी संख्या को एक निश्चित संख्या में बार-बार जोड़ा जाता है, तो उसे गुणा कहते हैं। इसे (×) चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है।
महत्व: इसके माध्यम से बड़ी संख्याओं के समूहों की कुल मात्रा को बहुत कम समय में निकाला जा सकता है।
4. भाग (Division)
अर्थ: किसी संख्या या वस्तु समूह को बराबर-बराबर भागों में बांटने या किसी संख्या में से दूसरी संख्या को बार-बार घटाने की प्रक्रिया को भाग कहते हैं। इसे (÷) चिन्ह से दर्शाया जाता है।
महत्व: यह गुणा की विपरीत संक्रिया है। इसका उपयोग न्यायसंगत वितरण और बराबर हिस्से तय करने के लिए किया जाता है।
नोट: प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को इन चारों मूलभूत संक्रियाओं का ज्ञान ठोस वस्तुओं (जैसे कंकड़, गोलियों, तीलियों) और चित्रों के माध्यम से कराया जाता है ताकि उनकी अवधारणा स्पष्ट हो सके।
[I] कक्षा-तीन की गणित पुस्तक में शिक्षण संकेत के अन्तर्गत लिखा गया है कि - "शिक्षक तालिका (10 से 1000 तक की संख्याएँ) भरवाते समय संख्याओं को लिखने के साथ-साथ पढ़ने के लिए प्रेरित करें।" यह संकेत बताता है कि -
(i) शिक्षक लापरवाह जिन्हें सूचित करना आवश्यक है।
(ii) बच्चे लापरवाह होते हैं अतः शिक्षक को बताना ही पड़ेगा।
(iii) शिक्षक तालिका भराते समय पढ़ने को नहीं बोलते।
(iv) शिक्षक के लिए मात्र संकेत है ताकि बच्चे संख्याएँ पढ़ना भी सीख जायें।
[II] संख्याओं के बीच तुलना करते समय आप बच्चों को बतायेंगे कि -
(i) जिस संख्या के अंकों का मान बड़ा होगा वही बड़ी संख्या होगी।
(ii) जिस संख्या में अधिक अंक होंगे वही बड़ी संख्या होगी।
(iii) जिस संख्या में ज्यादा नौ होंगे वही बड़ी संख्या होगी।
(iv) उपरोक्त सभी कथन गलत हैं।
[III] यदि दो संख्याओं में अंकों की संख्या समान है तो शिक्षक द्वारा बच्चों को बताना होगा कि तुलना करते समय -
(i) दायीं तरफ के अंकों की तुलना कर छोटी या बड़ी संख्या बतायेंगे।
(ii) बायीं तरफ के अंकों की तुलना कर छोटी या बड़ी संख्या बतायेंगे।
(iii) बीच के अंकों की तुलना कर छोटी या बड़ी संख्या बतायेंगे।
(iv) उपरोक्त सभी कथन असत्य हैं।
[IV] यदि तीन अंकों वाली संख्याओं में बायीं ओर के अंक समान हैं तब उनकी तुलना हेतु अपने विद्यार्थियों को बताना होगा कि -
(i) मध्य वाले अंकों की तुलना करके छोटी या बड़ी संख्या बताएं।
(ii) अंत वाले अंकों की तुलना करके छोटी या बड़ी संख्या बताएं।
(iii) मध्य एवं अंत वाले दोनों अंकों की तुलना करके छोटी या बड़ी संख्या बताएं।
(iv) उपरोक्त सभी कथन सत्य हैं।
[V] कक्षा-3 की गणित पुस्तक में एक प्रश्न दिया है कि "751 एवं 749 में बड़ी संख्या पर गोला लगाओ।" यह प्रश्न देने के पीछे बच्चे की किस दक्षता का मूल्यांकन करना है -
(i) उसे छोटी बड़ी संख्याओं की तुलना के नियम पता हैं या नहीं।
(ii) उसे गिनती आती है या नहीं।
(iii) उसे 1000 तक की संख्याओं का ज्ञान है या नहीं।
(iv) उपरोक्त सभी कथन सत्य हैं।
[VI] प्राथमिक स्तर पर बच्चों को आरोही क्रम व अवरोही क्रम का ज्ञान कराया जाता है। इसका मूल कारण किस दक्षता का बच्चे में विकास करना होता है -
(i) संख्याओं की समझ
(ii) संख्यात्मक मान
(iii) अंकों का स्थानीय मान
(iv) छोटी या बड़ी संख्या बताने की समझ।
[VII] कक्षा तीन की गणित पुस्तक में किसी प्रश्न में इस तरह दिया है - (i) 8, ___, 10 (ii) ___, 50, 51 (iii) 44, 45, ___ उपरोक्त खाली स्थानों में दो संख्याओं के बीच की / पहले की / बाद की संख्या को भरिए। उक्त प्रकार के रिक्त स्थानों से बच्चों में मुख्य रूप से किस दक्षता का विकास करना होता है?
(i) संख्याओं का ज्ञान
(ii) क्रमगत संख्या ज्ञान
(iii) छोटी व बड़ी संख्या का ज्ञान
(iv) स्थानीय मान का ज्ञान
[VIII] एक बच्चा कक्षा तीन में संख्या 715 को 700 + 100 + 500 लिखकर विस्तार करता है। इसका अर्थ है कि -
(i) विद्यार्थी को गिनती बढ़ाने की आवश्यकता है।
(ii) स्थानीय मान पढ़ाने की आवश्यकता है।
(iii) संख्याओं का जातीय मान पढ़ाने की आवश्यकता है।
(iv) छोटे या बड़े अंकों की पहचान कराना आवश्यक है।
[IX] संख्या 35,98,706 में अंक 5 के स्थानीय एवं जातीय मान का अंतर होगा -
(i) 599994
(ii) 499995
(iii) 489995
(iv) 499994
[X] कक्षा-3 के बच्चों को सम व विषम संख्याओं का ज्ञान कराने के लिए सर्वोत्तम विधि होगी -
(i) कंकड़, बीज, काँच की गोलियों के दो-दो के जोड़े बनाने की विधि से समझायें।
(ii) जिस संख्या में दो का भाग चला जाता है वे सम संख्याएँ होती हैं, समझाएं।
(iii) गिनती में 1 के बाद 2 से एक-एक के छोड़कर संख्याएँ विषम हैं, समझाएं।
(iv) गिनती लिखकर एक, तीन, पाँच को काट दें फिर शेष बची संख्याएं सम हैं, समझायें।
[XI] गणितीय संक्रियाएँ नहीं की जा सकती हैं -
(i) गणन संख्याओं पर।
(ii) क्रम सूचक संख्याओं पर।
(iii) दोनों पर संक्रियाएँ की जा सकती हैं।
(iv) उपरोक्त सभी कथन गलत हैं।
[XII] संख्या रेखा होती है - उपयुक्त कथन चुनिए—
(i) एक सरल रेखा जिस पर संख्याएँ अंकित करते हैं।
(ii) एक सीधी रेखा जिस पर क्रमागत संख्याएँ अंकित करते हैं।
(iii) एक सीधी रेखा जिस पर समान दूरी पर निशान लगाकर क्रमागत संख्याओं को प्रदर्शित करते हैं।
(iv) उपरोक्त सभी कथन गलत हैं।
[XIII] देवनागरी लिपि में अंक नौ लिखा जाता है -
(i) 9
(ii) ९
(iii) दोनों तरह
(iv) दोनों तरह से नहीं।
[XIV] रोमन संख्यांकन पद्धति में मूल प्रतीकों की संख्या है -
(i) 7
(ii) 8
(iii) 9
(iv) 10
[XV] रोमन लिपि में अंकों का दोहराव किया जा सकता है -
(i) I, V, X, L, C, D, M
(ii) I, X, C, M
(iii) IVX M
(iv) I X L C D M
[XVI] चार अंकों की संख्या में किसी स्थान पर 0 दिया हुआ है तो उसका मान होगा -
(i) इकाई, दहाई या सैकड़े का मान।
(ii) 0, 10, 100, 1000
(iii) केवल 0 ही होगा।
(iv) उपरोक्त सभी गलत हैं।
[XVII] कक्षा चार में गणित की पुस्तक में निम्न शिक्षण टीप दी गई है - "विद्यार्थियों को अबाकस के द्वारा कई संख्याओं के अंकों के स्थानीय मान समझायें। किसी संख्या को विस्तारित रूप में लिखना, विस्तारित रूप से संख्या बनाने का पर्याप्त अभ्यास करवायें। स्थानीय मान हेतु तीलियों का भी प्रयोग करें।" उपरोक्त शिक्षण संकेत से स्पष्ट है कि -
(i) शिक्षक को सहायक शिक्षण सामग्री का प्रयोग करना होगा।
(ii) गिनती के चार्ट का प्रयोग करना होगा।
(iii) श्यामपट का प्रयोग करना होगा।
(iv) उपरोक्त सभी कार्य करना अनिवार्य होगा ताकि बच्चे अच्छी तरह समझ सकें।
[XVIII] हिन्दू-अरेबिक संख्यांकन पद्धति की मुख्य विशेषता है कि -
(i) बड़ी से बड़ी संख्या लिखी जा सकती है।
(ii) शून्य तथा स्थानीय मान इस पद्धति की विशेषताएँ हैं।
(iii) उपरोक्त दोनों कथन सत्य हैं।
(iv) उपरोक्त दोनों कथन गलत हैं।
[XIX] कक्षा 5 के बच्चों को एक प्रश्न दिया गया है कि नीचे लिखी संख्याओं को हिन्दू अरेबिक संख्या पद्धति में लिखिए — (1) LXXX (2) XXIX (3) XIX. उपरोक्त अभ्यास कार्य से बच्चे में दक्षता का विकास होगा -
(i) रोमन संख्यांकन पद्धति का ज्ञान की।
(ii) हिन्दू-अरबी संख्यांकन पद्धति का ज्ञान की।
(iii) रोमन एवं हिन्दू अरबी संख्यांकन पद्धति के ज्ञान की।
(iv) रोमन एवं हिन्दू-अरबी अंकों के ज्ञान की।
[XX] संख्या 4256 में दस के निकटतम निकटन वाली संख्या होगी -
(i) 4000
(ii) 4300
(iii) 4250
(iv) 4260
[XXI] निकटतम निकटन द्वारा संख्या ज्ञान हो जाता है -
(i) लगभग आकलन
(ii) निश्चित संख्या
(iii) आकलन संभव नहीं
(iv) उपरोक्त सभी सत्य हैं
[XXII] विद्यार्थियों द्वारा अंकों में लिखी संख्या को शब्दों में लिखने को कहा जाता है - ऐसा विद्यार्थियों में किस दक्षता के विकास हेतु कहा जाता है -
(i) संख्याओं को पढ़ पाने की दक्षता
(ii) अक्षरों एवं संख्या शब्दों के ज्ञान की दक्षता
(iii) संख्याओं में स्थानीय मान की दक्षता
(iv) संख्याओं में जातीय मान की दक्षता
[XXIII] प्राथमिक कक्षाओं में गणित विषय में विभिन्न प्रकार के पैटर्न दिये होते हैं जिन्हें देखकर आगे की क्रियाविधि पूरी करने को निर्देशित किया जाता है। इससे बच्चे में किस दक्षता का विकास होता है -
(i) ज्ञान
(ii) कौशल
(iii) समझ
(iv) उपरोक्त सभी
XXIV. किसी संख्या में से उसी संख्या को घटाने पर प्राप्त होने वाला परिणाम क्या होता है?
(i) वही संख्या
(ii) शून्य (0)
(iii) एक (1)
(iv) अनंत
XXV. यदि किसी संख्या को 1 से गुणा किया जाए, तो गुणनफल पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(i) संख्या बदल जाती है
(ii) संख्या अपरिवर्तित रहती है
(iii) संख्या आधी हो जाती है
(iv) संख्या शून्य हो जाती है
XXVI. गणितीय संक्रियाओं में 'भाग की संक्रिया' का प्रतीक चिन्ह निम्नलिखित में से कौन सा है?
(i) +
(ii) -
(iii) ×
(iv) ÷
XXVII. निम्नलिखित में से कौन सी प्रक्रिया बार-बार घटाने का रूप मानी जाती है?
(i) जोड़ना
(ii) गुणा
(iii) भाग
(iv) इनमें से कोई नहीं
XXVIII. किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर गुणनफल हमेशा क्या प्राप्त होता है?
(i) वही संख्या
(ii) शून्य
(iii) एक
(iv) दस
XXIX. प्राथमिक स्तर पर बच्चों को गणित की संक्रियाएं सिखाने का मुख्य उद्देश्य क्या होता है?
(i) केवल परीक्षा पास कराना
(ii) दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित करना
(iii) केवल बड़ी संख्याएं याद रखना
(iv) केवल पहाड़े रटना
XXX. यदि 5 समूहों में प्रत्येक के पास 4 वस्तुएं हैं, तो कुल वस्तुओं की संख्या ज्ञात करने के लिए किस संक्रिया का प्रयोग किया जाएगा?
(i) भाग
(ii) घटाना
(iii) गुणा
(iv) इनमें से कोई नहीं
I (iv) शिक्षक के लिए मात्र संकेत है ताकि बच्चे संख्याएँ पढ़ना भी सीख जायें।
II (ii) जिस संख्या में अधिक अंक होंगे वही बड़ी संख्या होगी।
III (ii) बायीं तरफ के अंकों की तुलना कर छोटी या बड़ी संख्या बतायेंगे।
IV (i) मध्य वाले अंकों की तुलना करके छोटी या बड़ी संख्या बताएं।
V (iv) उपरोक्त सभी कथन सत्य हैं।
VI (ii) संख्यात्मक मान
VII (ii) क्रमगत संख्या ज्ञान
VIII (ii) स्थानीय मान पढ़ाने की आवश्यकता है।
IX (ii) 499995
X (i) कंकड़, बीज, काँच की गोलियों के दो-दो के जोड़े बनाने की विधि से समझायें।
XI (ii) क्रम सूचक संख्याओं पर।
XII (iii) एक सीधी रेखा जिस पर समान दूरी पर निशान लगाकर क्रमागत संख्याओं को प्रदर्शित करते हैं।
XIII (ii) ९
XIV (i) 7
XV (ii) I, X, C, M
XVI (iii) केवल 0 ही होगा।
XVII (i) शिक्षक को सहायक शिक्षण सामग्री का प्रयोग करना होगा。
XVIII (iii) उपरोक्त दोनों कथन सत्य हैं。
XIX (iv) रोमन एवं हिन्दू-अरबी अंकों के ज्ञान की।
XX (iv) 4260
XXI (i) लगभग आकलन
XXII (i) संख्याओं को पढ़ पाने की दक्षता
XXIII (iii) समझ
XXIV - (ii) शून्य (0)
XXV - (ii) संख्या अपरिवर्तित रहती है
XXVI - (iv) ÷
XXVII - (iii) भाग
XXVIII - (ii) शून्य
XXIX - (ii) दैनिक जीवन की समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित करना
XXX - (iii) गुणा
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आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।
(I hope, the above information will be useful and important.)
Thank you.
R.F. Tembhre
(Teacher)
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1. गणित शिक्षण से चिंतन एवं तर्कशक्ति का विकास करना
2. गणित अध्यापन के प्रमुख उद्देश्य, चिंतन शक्ति का विकास
3. गणित शिक्षण से चिंतन एवं तर्क शक्ति का विकास
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